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हिंदी कहानी कर्मो का लेखा-जोखा | Karmo ka lekha Jokha

हिंदी कहानी कर्मो का लेखा-जोखा

Last Updated on March 23, 2021 by Manoranjan Pandey

हिंदी कहानी कर्मो का लेखा-जोखा !!

हिंदी कहानी कर्मो का लेखा-जोखा: आज की कहानी (Aaj ki Kahani) की शुरुआत इस प्रकार होती है, एक गाँव में एक फौजी था। बेचारा फौजी बहुत सरल और सीधा था। बचपन में ही उसके माँ बाप का देहांत हो गया था। वह अपने माता पिता का इकलौता संतान था। फौजी ने शादी भी नहीं की थी, सो उसके बच्चे भी नहीं थे, भाई नहीं, बहन नहीं, वह अकेला ही कमाता अकेला हीं खाता और और उसके खर्चे के बाद जो पैसे बच जाते वो उसे फौज में जमा करता जा रहा था। 
समय बीतता रहा, फिर एक दिन उसकी मुलाक़ात एक सेठ से होती है, जो फौज में माल सप्लाई करता था, उन दोनों के बिच परिचय बढ़ते बढ़ते दोस्ती में बदल जाती है। वो दोनों अक्सर मिलते जुलते थे और एक दूसरे का खैर-क्षेम पूछा करते थे। एक दिन सेठ उस फौजी के सामने एक प्रस्ताव रखता है कि मैं एक व्यापारी हूँ और मुझे व्यापार का अच्छा अनुभव भी है, सो तुम्हारे पास जो पैसे हैं मैं उसको अपने कारोबार में लगाकर कुछ हीं दिनों में बढ़ा दूंगा। 
फौजी ने कहा : सेठ जी भला इसमें मेरा क्या फायदा है ?
सेठ : अरे फौजी भाई जो पैसा तुम्हारे पास है वो बढ़ नहीं रहा बल्कि उतने के उतने ही पड़ा हैं यदि तुम मुझे दे दो तो मैं उसे कारोबार में लगा दूं तो, पैसे से पैसा बढ़ जायेगा और कारोबार में जो फायदा होगा उसमे हमदोनो बराबर के हिस्सेदार होंगे और तुम्हारा मूलधन भी तुम्हे मिल जाएगा। 
यह सुनकर फौजी बड़ा खुश हुआ और उसने अपना पैसा सेठ को देने को तैयार हो गया।
फौजी ने सेठ को अपने पैसा दे दिया। और सेठ जी ने उन पैसों को अपने व्यापार में लगा दिया। समय के साथ साथ सेठ का व्यापार भी बढ़ता गया, सेठ को खूब कमाई होने लगी और कुछ हीं दिनों में उसका कारोबार बढ़ गया। 
फौजी और उसका व्यपारि सेठ मित्र
फौजी अपने काम में ईमानदारी से लगा रहा।
परन्तु कुछ हीं दिन बाद बॉर्डर पर लड़ाई छिड़ गई, युद्ध कि घोषणा हो गई, और उस फौजी को लड़ाई में जाना पड़ गया। 
लड़ाई के मैदान में फौजी घोड़ी पर चढ़कर लड़ने गया। वह घोड़ी इतनी अड़ियल और बदतमीज थी कि फौजी जितनी ज़ोर से लगाम खींचता वह घोड़ी उतनी ही तेज़ भागता थी। 
लगाम इतनी बार खीेंचते खींचते उस घोड़ी के गल्फर तक कट-फट गया मगर वो फिर भी फौजी के वश में नहीं आ रही थी। परिणाम ये हुआ कि घोड़ी दौड़कर दुश्मनों के गोल घेरे में जाकर खड़ी हो गयी। दुर्भाग्य से फौजी दुश्मनों से बुरी तरह घिर गया और लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गया। और अंततः वह घोड़ी भी मरी जाती है।
जब सेठ को यह समाचार मिला कि युद्ध में फौजी की मौत हो गयी तो वो अंदर हीं अंदर बहुत खुश हो गया। सेठ का खुश होना उसके नियत की गवाही दे रही थी। सेठ को मालुम था कि उस फौजी का कोई वारिस तो है नहीं तो अब ये पैसा किसी को देना भी नहीं पड़ेगा।
सेठ मन ही मन ये सोचकर बहुत खुश हुआ की अब मेरे पास पैसा भी हो गया और मेरा बिज़नेस भी चमक गया। अब पैसा लेने वाला भी कोई नहीं रहा यह सोचकर सेठ बहुत खुश हुआ।

समय का चक्र घूमते देर नहीं लगता। कुछ हीं दिनों के बाद सेठ जी के घर में खुशिया आई, उनके घर लड़का पैदा हुआ। अब सेठ जी के ख़ुशी का ठिकाना नहीं कि भगवान की बड़ी दया है उनपर। सेठ की तो मानो लॉटरी लग गई हो, उसके पास खूब पैसा भी हो गया, उसका व्यापार भी खूब चल पड़ा और भगवान् की कृपा से लड़का भी हो गया और अब कोई लेने वाला भी नहीं रहा, सेठ जी बहुत खुश हुए।

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धीरे धीरे समय निकलता रहा और सेठ का वो लड़का बड़ा हो गया, वह लड़का समझदार था और पढ़ने में होशियार था। सेठ जी ने उसे ठीक से पढ़ाया-लिखाया।
जब वह लड़का पढ़ लिखकर बड़ा हो गया तो सेठ ने सोचा कि अब ये मेरा कारोबार सम्हाल लेगा। कुछ दिनों बाद सेठ ने अपने बेटे की शादी करा दी। शादी करते ही उनके घर में बहुरानी आ गई। अब सेठ ने सोचा कि चलो बेटे की शादी हो गई अब कारोबार सम्हाल लेगा। लेकिन कुछ दिन में उसके बेटे की अचानक तबियत खराब हो गई। 
अब सेठ अपने बेटे को डाॅक्टर के पास, हकीम के पास, वैद्य के पास दौड़ दौड़ के थक चुके हैं। वैद्य जी जो भी दवा दे रहे हैं वह दवा कोई असर नहीं दिखा रही है, बीमारी बढ़ती ही जा रही थी, खूब पैसा बरबाद हो रहा है पर बिमारी ठीक होने के बजाय और बढ़ती ही जा रही है, रोग ख़त्म नहीं हो रहा है और पैसा भी खूब लग रहा है। 
अन्त में डाॅक्टर ने भी हार मान ली और कह दिया कि मर्ज़ लाइलाज हो गया है। इसको कोई असाध्य रोग हो गया है और तुम्हारा ये बच्चा दो दिन में मर जायेगा। डाॅक्टरों एवं वैधों के जवाब देने पर सेठ निराश होकर बेटे को लेकर रोते-बिलखते हुए आ रहे थे कि रास्ते में एक आदमी मिला। उसने कहा, सेठ जी क्या हुआ बहुत दुखी लग रहे हो, क्या बात है ?
सेठ ने कहा : ये हमारा बेटा है, ये अब जवान है, हमने सोचा था ये हमारे बुढ़ापे कि लाठी बन कर मदद करेगा। पर अब ये बीमार हो गया है। बीमार होते ही हमने इसके इलाज के लिये खूब पैसा खर्च किया जिसने जितना मांगा उतना दिया
लेकिन आज डाॅक्टरों ने जवाब दे दिया अब ये बचेगा नहीं। डॉक्टर ने बताया की इसे असाध्य रोग हो गया है जो लाइलाज मर्ज़ है। अब इसे घर ले जाओ ये दो दिन से ज्यादा नहीं बचेगा। कहाँ नहीं इलाज कराया, अपने जीवन भर कि कमाई लगा दी इसे बचने में फिर भी इसका बचाना मुश्किल लग रहा है। अब तो जेब में दो आने ही बचे हैं। 
 
उस आदमी ने कहा: अरे सेठ जी तुम दिल छोटा मत करो, अधीर क्यों होते हो। आप में घर के पास आ जाओ वहां मेरे पड़ोस में एक वैद्य जी दवा देते हैं। उनकी दो आने की पुड़िया खाकर मुर्दा भी उठकर खड़ा हो जाता है। बस अब बिना देर किये जल्दी से तुम वैद्य जी की दवा ले आओ। सेठ जी दौड़कर गये, और वैद्य जी को सारा हाल कह सुनाया। वैद्य जी ने सेठ को दो आने की पुड़िया दी जिसे वो ले आये। उसने दवाई की पुड़िया अपने बेटे को खिलाई, पर बच्चा पुड़िया खाते ही मर गया। अब सेठ जी का रो रो के बुरा हाल है, सेठानी भी बदहवास रोये जा रही थी, और घर में बहुरानी और पूरा गांव भी रो रहा था। पुरे गांव में यह खबर फ़ैल गयी कि सेठ जी का बीटा भरी जवानी में मर गया और बहुरानी का जीवन जवानी में ही बर्बाद हो गया। बेचारी टूट ही गयी है।
तभी गाँव में अचानक एक महात्मा जी आ जाते हैं।
महात्मा ने गाँववालो से पूछा, भाई क्या कोई बताएगा ये रोना धोना क्यों हैं।
लोग बोले: महात्मा जी बेचारे इस सेठ का एक ही जवान लड़का था वो भी मर गया, इसलिए सब लोग रो रहे हैं। सब दुखी हो रहे हैं।
महात्मा बोले: सेठ जी ये रोना धोना क्यों ?
सेठ : महाराज जी आप कैसी बात करते हो जिसका जवान बेटा मर जाये वो रोयेगा नहीं तो भला क्या करेगा ?
महात्मा बोले : तो आपको क्यों रोना आ रहा है ?
सेठ बोला : महाराज मेरा बेटा मरा तो और किसको रोना आएगा।
महात्मा : उस दिन तो तुम बड़े खुश हो रहे थे सेठ।
सेठ : मैं किस दिन खुश हो रहा था, ये आप की कह रहे हैं ? 
महात्मा : तुम्हारे मित्र फौजी ने जिस दिन तुम्हे पैसा दिया था। 
सेठ : हाँ कारोबार के उससे पैसा लिया था तो खुशी थी।
महात्मा : और उस दिन तो आपकी खुशी का ठिकाना ही नहीं था सेठ जी।
सेठ : किस दिन कि बात कर रहे हैं आप ?
महात्मा: याद करो सेठ जिस दिन तुम्हारा फौजी मित्र मरा था तुम कितना खुश हो रहे थे ? अरे जिस दिन फौजी मर गया तुमने
तो सोचा कि अब क्या वो तो मर गया, तो पैसा भी नहीं देना पड़ेगा। तुम्हारे पास माल भी बहुत हो गया कारोबार भी खूब चमक गया और किसी को अब कुछ देना भी नहीं पड़ेगा, ये सोचकर बहुत खुश थे तुम। क्यों ?
सेठ : लज्जा से सर झुकाते हुए, हां महाराज ये सच है मैं खुश तो था।
महात्मा : और उस दिन तो तुम्हारी खुशी का ठिकाना न था सेठ, पता नहीं कितनी मिठाईयां बाँटी थी तुमने।
सेठ : किस दिन ?
महात्मा : अरे सेठ जी जिस दिन तुम्हारा लड़का पैदा हुआ था।
सेठ : महाराज इसमें गलत क्या है ? लड़का पैदा होता है तो कौन खुश नहीं होता है। मैं भी खुश हो गया तो क्या बात हो गई?
महात्मा : उस दिन तो खुशी से आपके पैर ज़मीन पर नहीं पड़ते थे ।
सेठ : महाराज किस दिन ?
महात्मा : अरे जिस दिन तुम अपना बेटा ब्याहने जा रहे थे।
सेठ : महाराज भला बेटा ब्याहने जाता है कौन खुश नहीं होता ? हर आदमी खुश होता है तो मैं भी खुश था।
महात्मा : जब इतनी बार खुश हो गए सेठ , तो ज़रा सी बात के लिए रो क्यों रहे हो?
सेठ : महाराज ये आपको ज़रा सी बात लगता है। मेरा जवान बेटा मर गया ये ज़रा सी बात है क्या ?
महात्मा : अरे सेठ जी शायद तुम अब भी नहीं समझे ? वही तुम्हारा फौजी दोस्त अपना पैसा लेने के लिए तुम्हारे घर बेटा बन कर आ गया। उसकी पढ़ाई लिखाई में, खाने में, पहनने में, और उसके शौक मेें श्रृंगार में जितना धन लगाना था तुमने लगाया। और उसके शादी ब्याह में कुछ लग गया। और बचा खुचा ब्याज दर ब्याज लगाकर उसने डाक्टरों को दिलवा दिया।
अब जब तुम्हारे जेब में मात्रा दो आने पैसे बच गये, वो भी वैद्य जी को दिलवा दिये और 2 पैसे का पुड़िया खाकर चल दिया। अब कर्मो का लेना देना पूरा हुआ, जैसी करनी वैसी भरनी।
सेठ ने कहा : महाराज हमारे साथ तो कर्मो का लेन देन था। चलो मान लिया हमारे साथ तो जो हुआ सो हुआ। लेकिन वो हमारी जवान बहुरानी घर में तड़प रही है बेसुध रो रही है, भरी जवानी में उसको धोखा देकर विधवा बनाकर चला गया उसका क्या जुर्म था महाराज कि उसके साथ ऐसा गुनाह किया ?
महात्मा बोले : यह वही घोड़ी है। जिसने जंग में उसको धोखा दिया था, भरी जवानी में उसको उस घोड़ी के वजह से धोखा मिला और वो मारा गया। इसने भी जवानी में उसको धोखा दे दिया।
निष्कर्ष : हमारे जीवन में जो कुछ भी हो रहा है वो सब हमारे कर्मो का लेखा-जोखा है, जिसका हिसाब किताब हमें एक दिन तो देना ही पड़ता है। इसलिए हमें कभी किसी का बुरा नहीं करना चाहिए सब के साथ प्रेम और ईमानदारी के साथ रहना चाहिए। 

उम्मीद और आशा करते हैं आज की हिंदी कहानी “कर्मो का लेखा-जोखा” आपको अवश्य पसंद आया होगा । कृपया कमेंट के माध्यम से हमें अपना विचार बताएं । 

धन्यवाद ।

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