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भारत में बौद्ध धर्म की असफलता का मूल कारण क्या हो सकता है

भारत में बौद्ध धर्म की असफलता के कारण

Last Updated on February 18, 2021 by Manoranjan Pandey

भारत में बौद्ध धर्म की असफलता के कारण 

भारत में बौद्ध धर्म की असफलता के कई सारे कारण हो सकते हैं परन्तु जो महत्वपूर्ण कारण है वह इस post के माध्यम से बताने का प्रयास किया गया है.

भारत में बौद्ध धर्म की शुरुआत 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व में महात्मा बुद्ध के द्वारा हुआ था.

प्राचीन भारत के लुम्बिनी ( वर्तमान में नेपाल ) में शाक्यों के राजा शुद्धोधन के पुत्र के रूप में राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ.

गौतम बुद्ध को मगध (वर्तमान में बिहार) के बोधगया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई और वो महात्मा बुद्ध कहलाए. 

 

भारत में बौद्ध धर्म की असफलता के कारण
बौद्ध धर्म शिक्षा

भारत में बौद्ध धर्म को संरक्षण 

 

मगध के तत्कालीन राजा बिंबिसर ने उन्हे संरक्षण दिया. राजा बिंबिसार भी स्वयं बौद्ध धर्म को अपनाया एवं औरों को भी बौद्ध धर्म स्वीकारने के लिए प्रेरित किया. और राजा बिंबिसार ने मगध राज्य में कई बौद्ध विहारों का निर्माण कराया. इन बौद्ध विहारों के हीं कारण मगध को विहार कहा गया, जो बाद में (अपभ्रंश) बिहार के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

सारनाथ में बुद्ध के पहले प्रवचन के साथ बुद्ध ने धर्मचक्र का प्रतिपादन किया और पहले संघ की स्थापना भी वहीं की. उस समय बुद्ध के जो अनुयायी होते थे उन्हें सौगत या शाक्य या शाक्यमुनी कहते थे. बुद्ध ने वेदों को नकारा और इसी कारण बौद्ध मत नास्तिक कहलाता है. अतः वैदिक ब्राह्मणों से इसे प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ी.

सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म को अपनाना

 

सम्राट अशोक जब बौद्ध हुए तो उन्होने न सिर्फ इसे संरक्षण दिया, बल्कि इसका प्रचार-प्रसार भी किया. ऐसा कहते हैं कि अशोक ने अपने दो ब्राह्मण उपदेशकों राधास्वामी और मंजुश्री की बात मान कर कलिंग के युद्ध के पश्चात बौद्ध धर्म अपना लिया. उन्होने कलिंग से कभी माफी नहीं मांगी परंतु अपने हृदय परिवर्तन के संदेश को पत्थरों पर उकेरा और भारत और विश्व में बौद्ध प्रचारक भेजे. बुद्ध को गौरवान्वित करने वाले कई स्मारक बनाए गए. यही कारण था कि इनके बाद उत्तर भारत पर राज करने वाले यूनानी, शक और कुषाण राजा/क्षत्रप भी बौद्ध हुए.

भारतीय परंपरा शस्त्रबल से मतांतरण की नहीं रही. बल्कि शास्त्रार्थ और तर्क की रही है. अतः इन परस्पर वार्ताओं से बौद्ध मत में भी बदलाव हुए. महायान, वज्रयान और थेरवाड़ जैसे पंथ बने. वज्रयान शैव, गरुड़ और वैष्णव तंत्र से अत्यंत प्रभावित हुआ. इसमें शैव सिद्धान्त की बड़ी मान्यता है.

अशोक के बाद कुषाणों ने शाक्यों को संरक्षण दिया. यह सिलसिला पाल और सेन राजाओं तक जारी रहा. उन्होने बंगाल और बिहार में बुद्ध की पताका फहराई.

इतने लंबे राजसी संरक्षण और प्रचार के बाद भी आज भारत में पारंपरिक बौद्ध बड़ी कम संख्या में हैं. इसके कई कारण हैं.

भारतीय राज्य चाहे किसी भी मत को संरक्षण देते हों, उनके राजा चाहे किसी भी गुरु को मानते हों, वो सभी ब्राह्मणों, मुनियों और उपदेशकों पर समान दृष्टि रखते थे. यह हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है. अधिकतर दान कार्य राजसी महिलाओं या व्यापारियों द्वारा किया जाता था. राज्य द्वारा मुद्राओं के दान की कोई खास परंपरा नहीं रही। भू-दान राजा करता था.

 

भारत में बौद्ध धर्म की बाधायें और पतन   

 

इसके अलावा बौद्ध मत के इस संरक्षण में युद्ध काल की बाधा पड़ती रही. चूंकि बौद्ध अहिंसा सिखाते हैं, युद्ध काल में इन्हें बढ़ावा देना किसी राज्य के लिए बेहतर नहीं था. इसके अलावा बौद्ध भिक्षु राज्य द्वारा दिये गए दान से अपना पेट पालते थे, कई अपनी संपत्ति बनाने लगे और कुछ तो खुल कर व्यावसायिक गतिविधियों में संलग्न हो गए। तो प्रचार के लिए आई मुद्रा का सही उपयोग एक चुनौती हो गया.

गुप्त वंश ने हिन्दू विश्वासों को संरक्षण दिया और उनके काल में हिन्दू और बौद्ध के बीच की रेखाएँ धुंधली हो गईं. महायान पंथ का कर्मकांडों पर ज़ोर होने लगा जिससे शैव और वैष्णव मत लोकप्रिय हो गए. हालांकि गुप्त राजाओं ने बौद्ध मठ बनवाए, नालंदा का विश्वविद्यालय बनवाया, परंतु फिर भी बौद्ध मठों के आय का साधन नष्ट होता चला गया.

आदि गुरु शंकराचार्य और बौद्ध धर्म

इस बीच भारत में बौद्ध धर्म की असफलताओं के कारणों में जो एक मुख्य कारण था वो थे आदि शंकराचार्य. जिन्होंने अद्वैत वेदान्त की स्थापना की और बौद्ध मुनियों को शास्त्रार्थ में हरा अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की. उनके अभियान से कमजोर पड़ते सनातन विश्वास को नया जीवन मिला. ११वीं शताब्दी तक अफगानिस्तान और उत्तर भारत में बौद्ध मत कमजोर हो चुका था.

इसके बाद हूण आक्रमणों में कई बौद्ध मठ नष्ट कर दिये गए.

कालांतर में मध्य एशिया पर इस्लाम का कब्जा हुआ. बौद्ध से मुसलमान बने तुर्कों ने बौद्ध मत के प्रतिपादक भारत पर आक्रमण किया और १२वीं सदी के अंत तक पश्चिमी भारत से भी बौद्ध मत लगभग नदारद हो चुका था. इस्लाम के आगमन से मठों और भिक्षुओं को मिलने वाला अनुदान खत्म हो गया. इस्लाम के प्रचार से जनता बुद्ध से विमुख हुई और व्यवसायियों से होने वाली आय भी नष्ट होती चली गई. अभी तक मिलने वाले भू-दान की परंपरा भी खत्म हो गयी. और कई मठ मंदिर लूट लिए गए या ध्वस्त कर दिये गए. इस्लाम ने लगातार बौद्ध मूर्तियों को ध्वस्त किया, मठों को दी गई भूमि पर कब्जा किया और इस्लामी कर प्रणाली लागू कर आय के स्रोतों को सुखा दिया.

शाक्यमुनियों को संरक्षण देने वाला अंतिम राज्य – पाल – का १२वीं शताब्दी में पतन हो गया और इस्लामी आक्रमणकारियों ने एक बार फिर स्मारकों और मठ-मंदिरों का भीषण विध्वंश किया.

कुछ बौद्ध भिक्षुओं ने दक्षिण भारत के साम्राज्यों की शरण ली. इसके अलावा हिमालय के कुछ इलाकों – जैसे लद्दाख – में बौद्ध मत बच पाया.

स्वतंत्रता के बाद भारत में बौद्ध धर्म

स्वतन्त्रता के बाद डॉक्टर आंबेडकर ने दलित हिंदुओं के बीच बौद्ध मत को बढ़ावा दिया. नेहरू ने जब मौर्य साम्राज्य से आधुनिक भारत के चिह्न उठाए तो हिन्दू विश्वासों के ऊपर बौद्ध मत तो तरजीह दी. २,५००वीं बुद्ध जयंती के लिए १९५६ में भारतीय सरकार ने सहयोग किया. एशियाई बौद्ध समूहों को मंदिर और धर्मशालाएँ बनाने के लिए कर-मुक्त जमीन भी दी गयी. इसके अलावा महाबोधि समाज जैसे कई बौद्ध संगठन भी इस शाक्य परंपरा को बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं. आज के अधिकतर भारतीय बौद्ध इस नए अभियान का परिणाम हैं.

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