मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं एवं जीवन परिचय | Maithili Sharan Gupt Kavya Kriti

Last Updated on August 27, 2023 by Manu Bhai

मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं: इस विषय पर जानकारी लेने से पहले, हमें समझना जरूरी है कि वास्तव में मैथिलीशरण गुप्त कौन हैं और उनका जीवन कैसा था। मैथिलीशरण गुप्त भारत के एक महान कवि थे, जिन्होंने हमारी संस्कृति को उन्नत बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। वे हिंदी साहित्य के सबसे लोकप्रिय कवि में से एक हैं जो आज भी हमें उनकी कविताओं के द्वारा शिक्षा देते हैं। मैथिलीशरण गुप्त हिंदी भाषा के महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध कवि थे। उनकी कविता लिखने की कला और देशभक्ति के कारण उन्हें राष्ट्रकवि का दर्जा मिला था।

उनकी कविताओं की विशेषता थी, कि वे खड़ी बोली में लिखी जाती थीं, इससे कवियों में उनका एक अलग ही स्थान रहा है। मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं स्वतंत्रता संग्राम में बहुत अहम भूमिका निभाई थीं। उनकी देश प्रेम की भावनाएं उनकी कविताओं में साफ़ साफ़ दिखती हैं। इसी कारण उनके जन्मदिन को भारत में राष्ट्रकवि दिवस के रूप में मनाया जाता है।

आज इस ब्लॉग के माध्यम से हम मैथिलीशरण गुप्त के जीवन के बारे में, उनकी साहित्यिक और काव्यगत विशेषताएं, मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं के बारे में और उनकी रचनाओं के बारे में जानेंगे। आप इस ब्लॉग को अंत तक पढ़कर मैथिलीशरण गुप्त के बारे में सभी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

मैथिलीशरण गुप्त जीवन परिचय 

तत्कालीन राष्ट्र कवि मैथिलिशरण गुप्त का जन्म उत्तर प्रदेश के झाँसी के चिरगांव में 3 अगस्त, सन 1885 ई० में हुआ था। इनके पिता भी एक उत्कृष्ट कवी थे, जिनसे प्रेरित होकर बचपन से ही मैथिलीशरण गुप्त को लेखन का शौक था। मैथिलीशरण गुप्त की पढ़ाई-लिखाई उनके घर पर ही हुई और उन्होंने वहाँ अपना लेखन भी जारी रखा था। उन्होंने हिंदी भाषा के साथ-साथ बंगाली और मराठी भाषाओं का भी अध्ययन किया। समय के साथ, कवि महावीर प्रसाद उनकी प्रेरणास्तोत्र बन गए, जिसका परिणाम उनके लेखन में भी दिखाई देता है। मैथिलीशरण गुप्त ने अपने जीवन काल में अपने लेखन द्वारा बहुत से लोगों को देश प्रेम के लिए प्रेरित किया और लोगों के जीवन पर एक मजबूत प्रभाव डाला। सन 1907 में, उनका “हेमंत शीर्षक” नामक लेख पत्रिका सरस्वती में प्रकाशित हुआ था। उनकी “भारत-भारती” नामक पुस्तक उनके बेहतरीन देश प्रेम का प्रतिनिधित्व करती है। मैथिलीशरण गुप्त जी की मृत्यु 12 दिसंबर 1964 को हुई थी, जब वह 78 वर्ष के थे। मैथिलिशरण गुप्त की कविताएं राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत होती हैं।

मैथिलीशरण गुप्त जीवन परिचय 

  • | जन्म तिथि | 03 अगस्त 1885 |
  • | निधन तिथि | 12 दिसम्बर 1965 |
  • | जन्म स्थान | चिरगाँव, झांसी, उत्तर प्रदेश, भारत |
  • | प्रमुख कृतियाँ | साकेत, यशोधरा, जयद्रथ वध, पंचवटी, अर्जन-विसर्जन, काबा-करबला |
  • | सम्मान और पुरस्कार | पद्म भूषण सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार |

मैथिलिशरण गुप्त की साहित्यिक विशेषताएँ

Maithilisharan Gupt Kavitayen

राष्ट्र भावना : मैथिलीशरण गुप्त जी एक ऐसे कवि थे, जिन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से राष्ट्र भावना और नारी के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन किया। उन्होंने देश की महानता और सौंदर्य का वर्णन किया है और देश के किसानों की दयनीय स्थिति पर भी चर्चा की है।

नारी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण : मैथिलीशरण गुप्त जी की कविताओं में नारी को भी विशेष महत्व दिया गया है। उन्होंने यशोधरा, उर्मिला और कैकयी जैसी उपेक्षित नारियों को भी अपनी कविताओं में स्थान दिया। मैथिलीशरण गुप्त जी ने नारी के महत्व को बताते हुए कहा कि नारी जीवन का संचालन करती है और उन्हें सम्मान देना चाहिए।

नारी के प्रति सहानुभूति : इसी तरह मैथिलीशरण गुप्त जी ने नारी के प्रति सहानुभूति प्रकट करते हुए कहा कि –

अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी, आंचल में है दूध और आँखों में पानी”

उन्होंने नारी के संघर्ष को भी बताया है और उन्हें उनके संघर्षों के लिए सलाम किया है।

ज्ञान और शिक्षा : मैथिलीशरण गुप्त जी को शिक्षा और ज्ञान के प्रति बहुत गहरा आकर्षण था। वे अपनी कविताओं में ज्ञान व विद्या को उत्साहपूर्वक बताते थे। उन्होंने अपनी कविताओं में अक्सर शिक्षा के महत्त्व को उजागर किया है। उन्होंने अपनी रचना “विद्यालय” में विद्यालय के महत्व का वर्णन किया है। वे शिक्षा के महत्व को अपने छात्रों के जीवन में बहुत गहराई से समझाते थे। मैथिलीशरण गुप्त जी का ज्ञान और शिक्षा के प्रति आकर्षण उनकी लेखनी में अधिक दिखता है।

मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं एवं जीवन परिचय

प्रेरणा : मैथिलीशरण गुप्त जी अपने काव्य में लोगों को प्रेरित करते थे। वे अपनी कविताओं में लोगों के जीवन में प्रेरणा के स्रोत के रूप में उठते थे। वे लोगों को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे। मैथिलीशरण गुप्त जी की कविताएं जीवन में एक सकारात्मक उर्जा का स्रोत होती हैं। उनकी कविताओं में जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की जाती है, जो आम जनता के लिए उपयोगी होते हैं। उनकी रचना “वृक्ष” में वे वृक्षों के साथ अपने जीवन का तुलना करते हुए लोगों को उनसे सीखने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने वृक्ष के उदय और अस्त होने की समझ बताई है और लोगों को उसी तरीके से अपने जीवन के सभी पहलुओं के साथ संघर्ष करने की प्रेरणा दी है।

मैथिलीशरण गुप्त जी की कविताओं का एक अन्य महत्वपूर्ण विषय है स्वतंत्रता और राष्ट्रीय उत्थान। उनकी कविताओं में भारत की आज़ादी और स्वतंत्रता लड़ाई पर बहुत गहराई से चर्चा की गई है।उनकी कविताओं से हम उनकी सकारात्मक सोच का पता लगा सकते हैं जो लोगों के मन में उनके लिए एक आदर्श बनती है। उनकी कविताएं लोगों को संतुलित जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएँ

प्रमुख रचनाएँप्रकाशन वर्ष 
रंग में भंग1909 ई.
जयद्रथवध1910 ई.
भारत भारती1912 ई.
किसान1917 ई.
शकुन्तला1923 ई.
पंचवटी1925 ई.
अनघ1925 ई.
हिन्दू1927 ई.
त्रिपथगा1928 ई.
शक्ति1928 ई.
गुरुकुल1929 ई.
विकट भट1929 ई.
साकेत1931 ई.
यशोधरा1933 ई.
द्वापर1936 ई.
सिद्धराज1936 ई.
नहुष1940 ई.
कुणालगीत1942 ई.
काबा और कर्बला1942 ई.
पृथ्वीपुत्र1950 ई.
प्रदक्षिणा1950 ई.
जयभारत1952 ई.
विष्णुप्रिया1957 ई.
अर्जन और विसर्जन1942 ई.
झंकार1929 ई

Maithili Sharan Gupt Hindi Kavitayen

मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं

मैथिलीशरण गुप्त कविताएं

सखि, वे मुझसे कहकर जाते (यशोधरा)

Sakhi Wo Mujhse Kahkar jaate

सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?

               मुझको बहुत उन्होंने माना
               फिर भी क्या पूरा पहचाना?
               मैंने मुख्य उसी को जाना
               जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
               प्रियतम को, प्राणों के पण में,
               हमीं भेज देती हैं रण में –
               क्षात्र-धर्म के नाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               हुआ न यह भी भाग्य अभागा,
               किसपर विफल गर्व अब जागा?
               जिसने अपनाया था, त्यागा;
               रहे स्मरण ही आते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
               पर इनसे जो आँसू बहते,
               सदय हृदय वे कैसे सहते?
               गये तरस ही खाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
               दुखी न हों इस जन के दुख से,
               उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से?
               आज अधिक वे भाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               गये, लौट भी वे आवेंगे,
               कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
               रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
               पर क्या गाते-गाते?
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

– मैथिलीशरण गुप्त

Ref: Swantah Sukhaaya
Pub: National Publishing House, 23 Dariyagunj, New Delhi – 110002

मैथिलीशरण गुप्त की कविता सखि, वे मुझसे कहकर जाते

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मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं ” दोनों ओर प्रेम पलता है ”

दोनों ओर प्रेम पलता है।
सखि, पतंग भी जलता है हा! दीपक भी जलता है!

सीस हिलाकर दीपक कहता–
’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’
पर पतंग पड़ कर ही रहता

        कितनी विह्वलता है!
        दोनों ओर प्रेम पलता है।

बचकर हाय! पतंग मरे क्या?
प्रणय छोड़ कर प्राण धरे क्या?
जले नहीं तो मरा करे क्या?

        क्या यह असफलता है!
        दोनों ओर प्रेम पलता है।

कहता है पतंग मन मारे–
’तुम महान, मैं लघु, पर प्यारे,
क्या न मरण भी हाथ हमारे?

        शरण किसे छलता है?’
        दोनों ओर प्रेम पलता है।

दीपक के जलनें में आली,
फिर भी है जीवन की लाली।
किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली,

        किसका वश चलता है?
        दोनों ओर प्रेम पलता है।

जगती वणिग्वृत्ति है रखती,
उसे चाहती जिससे चखती;
काम नहीं, परिणाम निरखती।

        मुझको ही खलता है।
        दोनों ओर प्रेम पलता है।

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मैथिलीशरण गुप्त की कविता ” अर्जुन की प्रतिज्ञा ”

उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उसका लगा,
मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा।
मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ,
प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ?

युग-नेत्र उनके जो अभी थे पूर्ण जल की धार-से,
अब रोष के मारे हुए, वे दहकते अंगार-से ।
निश्चय अरुणिमा-मित्त अनल की जल उठी वह ज्वाल सी,
तब तो दृगों का जल गया शोकाश्रु जल तत्काल ही।

साक्षी रहे संसार करता हूँ प्रतिज्ञा पार्थ मैं,
पूरा करूँगा कार्य सब कथानुसार यथार्थ मैं।
जो एक बालक को कपट से मार हँसते हैँ अभी,
वे शत्रु सत्वर शोक-सागर-मग्न दीखेंगे सभी।

अभिमन्यु-धन के निधन से कारण हुआ जो मूल है,
इससे हमारे हत हृदय को, हो रहा जो शूल है,
उस खल जयद्रथ को जगत् में मृत्यु ही अब सार है,
उन्मुक्त बस उसके लिये रौरव नरक का द्वार है।

उपयुक्त उस खल को न यद्यपि मृत्यु का भी दंड है,
पर मृत्यु से बढ़कर न जग में दण्ड और प्रचंड है ।
अतएव कल उस नीच को रण-मध्य जो मारूँ न मैं,
तो सत्य कहता हूँ कभी शस्त्रास्त्र फिर धारूँ न मैं।

अथवा अधिक कहना वृथा है, पार्थ का प्रण है यही,
साक्षी रहे सुन ये वचन रवि, शशि, अनल, अंबर, मही।
सूर्यास्त से पहले न जो मैं कल जयद्रथ-वध करूँ,
तो शपथ करता हूँ स्वयं मैं ही अनल में जल मरूँ।

मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं ” नर हो, न निराश करो मन को “

नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को

संभलों कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को

मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं एवं जीवन परिचय

निज़ गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को

प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को

करके विधि वाद न खेद करो
निज़ लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो

मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं एवं जीवन परिचय

रामधारी सिंह दिनकर की कविता संग्रह एवं जीवन परिचय [ Ramdhari Singh Dinkar Poems ]

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