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Temples of Khajuraho Architecture and Sculpture

Last Updated on January 27, 2021 by Manoranjan Pandey

स्थापत्य कला एवं मूर्तिकला की अनमोल धरोहर खजुराहो के मंदिर:

सम्पूर्ण भारत हीं नहीं बल्की पुरे विश्व में अन्य मंदिरों temples की तुलना में Temples of Khajuraho बेजोड़ कला की अनमोल धरोहर खजुराहो के मंदिर अपनी अलग विशिष्ट शैली के कारण विश्व भर में प्रशिद्ध हैं. शिल्प कला के नागर शैली का प्रयोग यहाँ पर और भी अधिक विकसित अवस्था में दिखाई देती है.

ऊँचे-ऊँचे पक्के चबूतरे पर बने यहाँ के मंदिर एवं उनके उन्नत सुसज्जित शिखरों का पर्वतों के समान उठना इस विशिष्ट शैली का हीं प्रमाण है.

चौसठ योगिनी, ब्रह्मा, व लालगुआन महादेव मंदिर के अतिरिक्त यहाँ के अन्य सभी मंदिर बलुआ पत्थर के बने हैं. जबकि चौसठ योगिनी, ब्रम्हा एवं लालगुआन महादेव मंदिर पूर्णतया अथवा अंशत: ग्रेनाइट पत्थर के बने हुये हैं.

मध्य भारत की शिल्पकला पर आधारित ये मंदिर अलग-अलग खंडो में बने होने के बावजूद भी आपस में कलात्मक रूप से एक दूसरे से जुड़े हुये हैं. 

इन मंदिरों को आंतरिक रूप में पांच भागों में बाँटा जा सकता है. These Temples of Khajuraho are divided into Five Parts

  1. प्रवेश कक्ष: जिसे अर्ध मंडप भी कहा जाता है. यह मंदिर का प्रथम भाग होता है जहाँ से मंदिर में प्रवेश किया जाता है. 
  2. महामंडप: यह चबूतरे वाला भाग होता है, जिसे महामंडप कहा जाता है. प्रायः इसका प्रयोग धार्मिक उतसवों पर नृत्यांगनाओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान धार्मिक नृत्य के लिए किया जाता था.
  3. अंतराल: मंदिर के इसी भाग से पुजारी लोगों को पूजन-पाठ इत्यादि अनुष्ठान करने में सहायता किया करते थे. इस भाग का गर्भगृह व महामंडप से सीधा संपर्क होता है. 
  4. गर्भगृह: मंदिर का यह भाग सबसे महत्वपूर्ण माना गया है जहाँ मंदिर के इष्टदेव व आदि देवता विराजमान होते हैं.
  5. परिक्रमा स्थल: मंदिर का पांचवा एवं अंतिम भाग जो मंदिर के बाह्य दीवार (बाहरी दीवार) और गर्भगृह की बाह्य दीवार के मध्य होता है. प्रायः परिक्रमा स्थल सभी बड़े मंदिरों में पाया जाता है .
परिक्रमा स्थल

ये मंदिर न केवल बाहरी बनावट के लिए बल्कि आंतरिक सजावट की जीती जागती आकृतियों के लिए भी प्रसिद्ध है. 

मंदिर का गर्भ गृह

Top Visiting Temples Of Khajuraho

एक समय यहाँ पर 85 कलापूर्ण मंदिरों के होने का प्रमाण मिलता है. लेकिन रख-रखाव के आभाव और लोगों की उपेक्षा के कारण वर्तमान में केवल 25 मंदिर हीं शेष बचें हैं. वर्तमान के  खजुराहो में मंदिरों से ज्यादा मंदिरों के खंडहर पाये जाते हैं जो कि 13 km के क्षेत्र में फैला हुआ है.

स्थापत्य कला की इन अनमोल दिनों में मूर्ति कला का भी अति सुन्दर चित्रण किया गया है. यहाँ के मंदिरों की मूर्तियाँ इष्ट देवों की प्रतिमाओं के साथ साथ उनके समस्त परिवार, सेवकों, गणधरो, गंधर्वों, आदि के साथ साथ नारी सौंदर्य का चित्रण, कामसूत्र कला का चित्रण तथा तत्कालीन, सामान्य जन जीवन, एवं सजीव दृश्यों को भी दर्शाते हैं. 

खजुराहो मंदिरों की मूर्तिकला में प्राचीन भारत के 3 प्रमुख शिल्प विद्यालयों (School of Art ) मथुरा, गांधार, एवं रावती द्वारा प्रचलित मूर्तिकला में मथुरा मूर्तिकला का उत्कृष्ट उदाहरण है. 

खजुराहो के मंदिर और कामसूत्र का चित्रण Temples of khajuraho and Kamsutra

खजुराहो के अधिकांश मंदिरो में श्रृंगार रस तथा काम क्रीड़ा के अनगिनत दृश्य अंकित हैं. जिससे ज्ञांत होता है कि उस ज़माने में इस भावना को व्यक्त करने अथवा अंकित करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी. इसपर कोई सामाजिक अथवा राजकीय रोक नहीं थी और उस काल में लोग भी चरित्रवान थे. यही वजह रही कि इस प्रकार के रसिक दृश्य धार्मिक स्थलों पर बेरोक-ठोक अंकित किये गए. 

खजुराहो के मंदिरों को विश्व प्रसिद्धि दिलाने में अगर किसी चीज का सबसे बड़ा योगदान है, तो वो हैं कामसूत्र कला कि नग्न मूर्तियां जो वहाँ के मदिरों के बाहरी दीवारों कि शोभा बढाती हैं. साथ ही पुरे विश्व को अपनी ओर आकर्षित भी करतीं हैं. यह सचमुच नारी सौंदर्य के ऐसे भावों को दर्शाती है जिनकी भाव भंगिमा किसी को भी मंत्र मुग्ध कर दें.

यह सचमुच उन शिल्पियों कि साधना, धैर्य, एवं उत्साह का हीं परिणाम है कि उनके छैनी-हथौड़ी से पत्थरों पर इतनी भव्य, विशाल, व सुन्दर मूर्तियां बन गयीं. और यह कामुक मूर्तियां सदा ज़े हीं दर्शकों और पर्यटकों को चौकाती और लुभाती रहीं हैं. 

इन कलापूर्ण मदिरों Temples of khajuraho को देखने के लिए पुरातत्व विभाग ने इनकी भौगोलिक स्थिति के अनुसार इन्हे तीन भागों में बाँट दिया है.

 पश्चमी समूह (Western group) 

 पूर्वी समूह (Eastern group)

 दक्षणि समूह (Southern group 

 

पश्चमी समूह (Western group) 

खजुराहो में जितनी भी मंदिर हैं उनमें से सबसे प्रमुख बड़ा, भव्य, एवं कलापूर्ण मंदिर समूह है पश्चमी समूह. खजुराहो के पश्चिम में होने के कारण पश्चमी समूह कहलाने वाले इस समूह में 12 दर्शनीय स्थल हैं. जिनमें लक्ष्मण मंदिर, कंदारिया महादेव मंदिर, विश्वनाथ मंदिर, जगदम्बा मंदिर, चौसठ योगिनी आदि प्रमुख हैं. 

इस समूह के कुछ प्रमुख मंदिर हैं…..

1. कंदारिया महादेव मंदिर

खजुराहो का सबसे उत्कृष्ट मंदिर कंदारिया महादेव मंदिर है जो कि चौसठ योगिनी मंदिर के उत्तर की ओर स्थित है. “कंदारिया” का अर्थ होता है गुफा का भीतरी भाग एवं “महादेव” कहते हैं भगवान शिव को, अर्थात गुफा या कंदराओं में निवास करने वाले देवता या महादेव.

इस मंदिर का निर्माण गंडदेव के पुत्र विद्याधर द्वारा सन 1065 ईसवी में किया गया था. भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर मध्ययुगीन स्थापत्य एवं शिल्पकला का अनमोल उदाहरण है. अपनी विशालता एवं अंगों की पूर्ण समानता व अनुरूपता से प्रभावित इस मंदिर की दिवार का एक एक इंच मंदिर निर्माणकला के उच्च विकास को चित्रित करता है. इस समय इस क्षेत्र में स्थापत्य कला का विकास अपने शिखर पर था.

कहते हैं की जब महाराजा विद्याधर ने लगातार दूसरी बार महमूद गज़नी को परास्त करने में सफलता प्राप्त की तब उन्होंने इसे भगवान शिव की कृपा एवं आशीर्वाद माना. और उन्होंने भगवान शिव का यह मंदिर बनवाया. 

इस कंदारिया महादेव मंदिर के प्रवेश द्वार सुसज्जित तोरण द्वारा सुशोभित है. इसके ऊपर नाना प्रकार की मूर्तियां खुदी हुई हैं, तथा इनमें विभिन्न प्रकार के वाद्ययन्त्र बजाते हुये संगितपुरुष, घड़ियाल, आलिंगनवध प्रेमी जोड़े, देवी देवता के चित्र दिखाई देते हैं. इसमें जन्म-मरण, युद्ध, नृत्य, सृजन, संरक्षण व संघार एवं राग-विराग आदि सभी प्रकार की दृश्य को बहुत ही खूबसूरती से उकेरा गया है. ठीक उसके आगे महामंडप है जिसकी छत पर अविस्मरणीय खुदाई और carvings का काम किया हुआ है. 

2. चौसठ योगिनी मंदिर

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Chausath Yogini Temple

शिव सागर झील के दक्षिण-पश्चिम की ओर स्थित है यह चौसठ योगिनी मंदिर खजुराहो का सबसे प्राचीन मंदिर है. छत विहीन यह मंदिर चंदेल राजवंश के अस्तित्व में आने के लगभग 300 वर्ष पूर्व 6th ce. में पूर्णतः लावा पत्थर का बनवाया गया था. उस समय इस मंदिर में कुल 65 कमरे थे जबकि वर्तमान में केवल 35 कोठरी ही बचें हैं. यह मंदिर इस बात का धोतक भी है कि चन्देलों के अस्तित्व में आने के पहले भी यह क्षेत्र तंत्र-मंत्र के प्रभाव में था. क्योंकि 64 ‘चौसठ’ योगिनियों की पूजा तांत्रिकों द्वारा हीं की जाती थीं. 

3. विश्वनाथ एवं नन्दी मंदिर 

पश्चमी समूह के मंदिरों में से एक कंदारिया महादेव मंदिर के सदृश्य विश्वनाथ मंदिर का निर्माण लगभग 1002 Ce. में महाराजा धनगदेव द्वारा करवाया गया था. कंदारिया महादेव मंदिर के सदृश्य यह मंदिर भी भगवान शिव को समर्पित है. पंचायतन शैली में बने यह मंदिर 90 ft ऊँचे एवं 46 ft चौड़ा है.प्रवेश द्वार की ओर जाती सीढ़ी पर एक ओर दो 2 शेर तथा दूसरी ओर दो 2 हाथी भी बने हुये हैं. बाहर की ओर सर्वप्रथम धर्म उपदेश देते हुये ज्ञान मुद्रा में श्री गणेश जी के दर्शन होते हैं. यह मंदिर अंदर एवं बाहर से पूर्ण रूपेण स्थापत्य एवं शिल्प कला का वर्णन करते हैं. मंदिर के अंदर दक्षिण की ओर शिव द्वारा अंधकासुर का वध तथा पश्चिम की ओर नटराज रूप और उत्तर में अर्धनारीश्वर रूप में भगवान शिव को अंकित किया गया है. 

गणेश

विश्वनाथ मंदिर के हीं एक ओर विशाल चबूतरे पर एक अन्य मंदिर नन्दी मंदिर के नाम से बना हुआ है. यह मदिर आकर में छोटा अवश्य है परन्तु इसमें भी भगवान शिव के वाहन नन्दी की 6 फिट ऊँची भव्य प्रतिमा दर्शनीय है. 

Nandi

4. लक्ष्मण मंदिर 

पंचायतन शैली में बना यह मंदिर खजुराहो के सबसे अधिक सुरक्षित मंदिरों में से एक है. 

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Western Group of Temples Khajuraho
Lakshman mandir

लक्ष्मण मंदिर Lakshmana Templeमध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले में प्रसिद्ध पर्यटन स्थल खजुराहो में स्थित है। खजुराहो, भारतीय आर्य स्थापत्य और वास्तुकला की एक नायाब मिसाल है। खजुराहो को इसके अलंकृत मंदिरों की वजह से जाना जाता है, जो कि देश के सर्वोत्कृष्ठ मध्यकालीन स्मारक हैं। चंदेल शासकों ने इन मंदिरों की तामीर सन 900 से 1130 ईसवी के बीच करवाई थी। लक्ष्मण मंदिर भगवान विष्णु के सम्मान में बनाया गया था। पत्थर से बनी यह एक शानदार संरचना है। पश्चिमी समूह से संबंधित यह सबसे प्राचीन मंदिर है।

निर्माण

 

लक्ष्मण मंदिर से ही प्राप्त एक अभिलेख से पता चलता है कि चन्देल वंश की सातवीं पीढ़ी में हुए यशोवर्मन ने अपनी मृत्यु से पहले खजुराहो में बैकुंठ विष्णु का एक भव्य मंदिर बनवाया था। इससे यह पता चलता है कि यह मंदिर 930-950 के मध्य बना होगा, क्योंकि राजा यशोवर्मन ने 954 में मृत्यु पायी थी। इसके शिल्प और वास्तु की विलक्षणताओं से भी यही तिथि उपयुक्त प्रतीत होती है। यह अलग बात है कि यह मंदिर विष्णु के बैकुंठ रूप को समर्पित है, लेकिन नामांकरण मंदिर निर्माता यशोवर्मन के उपनाम ‘लक्षवर्मा’ के आधार पर हुआ है।

धन्यवाद.

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