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वक़्त, अतीत और लम्हा (एक सोच)

Last Updated on January 9, 2019 by Manoranjan Pandey

वक़्त अतीत और लम्हा!

तो आइये एक एक कर जानते हैं

वक़्त

वक़्त कराहता नहीं वल्कि कड़वाहट भी लाता है, तभी तो आजमाया जाता है. फिर भी चलता रहता है बे-लगाम जो होता है. फितरत से अनजान होता है. फिकर करना उसकी धरोहर जो होता है, लेकिन अंजाम से बहुत दुर होता है, तभी तो एहसास के करीब होता है, इसीलिए तो अपनाया जाता है, उस खुदा का फरमान होता है. वही वक्त बदलने का नाम भी होता है. जो भी हो वक्तानुसार हर शय में परिवर्तन जरुरी होता है, इसी में सबका भला भी होता है. वक़्त बेवक्त वार भी वक़्त के साथ हीं होता है. कहीं ना कहीं उसका परिणाम सामने आ हीं जाता है और सब कुछ बदल जाता है…… सब कुछ.

वंदना गिरधर

अतीत 

अतीत की अनजान राहें राहगीर के लिए आसान नहीं थी. अनगिनत पेहरों से परेशानी बड़ी थी फिर भी अनदेखी – अनजानी कहानियाँ बड़ी थी. इसमें भी हैरानी हीं हैरानी थी. अकस्मात आंसुओ का सफर साथ था. कोई पास तो कोई बहुत दुर था. दलीलों की किसको खबर थी फिर भी दकियानूसी विचार हीं आगे था. जरुरत का मोहताज हर आगंतुक है. कभी मैं तो कहीं तू जो है. इंतजार सबको अपनी करनी का है, पर सब्र का इम्तिहान हर इक का है, जो अपने आप में इम्तिहान सबसे बड़ा है जिससे संतुष्ट बहुत कम इंसा होता है.
राहगीर की पहचान उसका अपना आइना हीं होता है
फिर भी पहचानने में गलती हो हीं जाती है.
है न अजीब, और अद्भुत भी.

वंदना गिरधर

लम्हा

ज़िन्दगी न रुकती है न रुक-रुक कर चलती है, न जाने रोज़ कितने लोग जन्म लेते हैं, और ना जाने कितने लोग मरते हैं. एक लम्हा प्यार का और दूसरा तकरार का यही है दुनिया का स्वरुप. बहुत संयम चाहिए जिनके लिए हर उम्र का अपना अपना तरीका और तकाज़ा हर दूजा इंसा एक दूजे की सोच से हीं हारा है. किसी को अपना बनाने की चाह और कहीं अपनों की खातिर खुद को गिरवी रखने का गम फिर भी दोनों संग संग.
ये है हमारी संस्कृति दुल्हन के लिबास से लेकर
‘सांसों की रफ़्तार तक का सच.’

धन्यवाद.

नोट : आप सब से आग्रह है की यदि यह पोस्ट अच्छा लगे तो कृपा कर कमेंट अवश्य करें .

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